रिपोर्ट 1967-68

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योजना आयोग

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1967–68 की रिपोर्ट में प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों के आधार पर योजना आयोग की भूमिका, संरचना और कार्यप्रणाली में किए गए महत्वपूर्ण परिवर्तनों का विवरण दिया गया है। 7 जुलाई 1967 को प्रधानमंत्री द्वारा लोकसभा में दिए गए वक्तव्य में यह स्पष्ट किया गया कि योजना आयोग पर कोई कार्यकारी दायित्व नहीं होगा और उसका मुख्य कार्य योजनाओं का निर्माण तथा उनके क्रियान्वयन का मूल्यांकन करना होगा। सरकार ने यह निर्णय लिया कि प्रधानमंत्री योजना आयोग के अध्यक्ष बने रहेंगे तथा वित्त मंत्री पदेन सदस्य होंगे। साथ ही, एक पूर्णकालिक उपाध्यक्ष और सीमित संख्या में पूर्णकालिक सदस्यों वाली एक छोटी एवं सुसंगठित संस्था के रूप में योजना आयोग का पुनर्गठन किया गया। इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय विकास परिषद के पुनर्गठन और उसके कार्यों के पुनर्परिभाषण का भी उल्लेख है। परिषद को राष्ट्रीय योजना के लिए मार्गदर्शक नीतियाँ निर्धारित करने, योजना आयोग द्वारा तैयार योजनाओं पर विचार करने, सामाजिक-आर्थिक नीतियों की समीक्षा करने तथा योजना के कार्यान्वयन की निगरानी का दायित्व सौंपा गया। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय तथा जनता की सक्रिय भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया। रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण भाग चौथी पंचवर्षीय योजना से संबंधित है। 1965 के युद्ध, विदेशी सहायता में कमी, 1965-67 के सूखे, बढ़ते आयात, घटते निर्यात, महँगाई और गैर-योजना व्यय में वृद्धि के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इन परिस्थितियों में संसाधनों की भारी कमी उत्पन्न हुई, जिसके कारण पहले तैयार की गई चौथी योजना के मसौदे में संशोधन आवश्यक हो गया। पुनर्गठित योजना आयोग ने यह निर्णय लिया कि बदली हुई आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप योजना की मान्यताओं और रूपरेखा की पुनः समीक्षा की जाए। समग्र रूप से यह रिपोर्ट भारत की योजना प्रक्रिया में संस्थागत सुधार, नीति-पुनर्गठन और यथार्थपरक आर्थिक नियोजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो संकट की परिस्थितियों में लचीली और विवेकपूर्ण योजना व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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भारत सरकार योजना आयोग

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Planning Commission - 1967

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