आयोजन प्रक्रिया

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योजना आयोग

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भारतीय अर्थव्यवस्था में आयोजन (योजनाबद्ध विकास) का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण तथा तीव्र विकास के उद्देश्य से पंचवर्षीय योजनाओं को अपनाया। योजनाबद्ध विकास के प्रथम बारह वर्षों में पहली, दूसरी तथा तीसरी पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक नीतियों में निरंतरता एवं क्रमबद्ध प्रगति देखने को मिलती है। प्रत्येक योजना ने पूर्ववर्ती योजना के अनुभवों और मूल्यांकन के आधार पर बदलती परिस्थितियों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया। योजनाबद्ध विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी हुई है, जिसमें निर्धनता उन्मूलन, औद्योगीकरण, किसानों और श्रमिकों के संरक्षण तथा सामाजिक न्याय पर विशेष बल दिया गया। महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं ने राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता को भी अनिवार्य माना। 1938 में राष्ट्रीय योजना समिति की स्थापना तथा स्वतंत्रता के बाद योजना आयोग के गठन ने भारत में आयोजन को संस्थागत रूप प्रदान किया। भारत के संविधान में वर्णित राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों ने आयोजन के सामाजिक उद्देश्य निर्धारित किए, जिनमें समान आजीविका के अवसर, संपत्ति का न्यायसंगत वितरण और आर्थिक शक्ति के संकेन्द्रण को रोकना शामिल है। योजना आयोग को संसाधनों के आकलन, प्राथमिकताओं के निर्धारण, योजनाओं के कार्यान्वयन, प्रगति के मूल्यांकन तथा आवश्यक नीतिगत संशोधनों की जिम्मेदारी सौंपी गई। आयोजन ने भारत जैसे अर्ध-विकसित देश में सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को दूर करने, संसाधनों के समुचित उपयोग, औद्योगिक और कृषि विकास को गति देने तथा दीर्घकालीन आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीव्र और निरंतर आर्थिक विकास के माध्यम से गरीबी, बेरोजगारी और असमानता जैसी समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार, योजनाबद्ध विकास ने भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता, आत्मनिर्भरता और संतुलित विकास की दिशा में अग्रसर किया।

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भारत सरकार योजना आयोग

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Planning Commission - 1965

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